कृष्ण का अंतिम समय

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कृष्ण का अंतिम समय

प्रभास के यादव युद्ध में चार प्रमुख व्यक्तियों ने भाग नहीं लिया, जिससे वे बच गये, ये थे- कृष्णबलराम, दारुक सारथी और वभ्रु। बलराम दु:खी होकर समुद्र की ओर चले गये और वहाँ से फिर उनका पता नहीं चला। कृष्ण बड़े मर्माहत हुए। वे द्वारका गये और दारुक को अर्जुन के पास भेजा कि वह आकर स्त्री-बच्चों को हस्तिनापुर लिवा ले जायें। कुछ स्त्रियों ने जलकर प्राण दे दिये।

अर्जुन आये और शेष स्त्री-बच्चों को लिवा कर चले।[1] कहते हैं कि मार्ग में पश्चिमी राजपूताना के जंगली आभीरों से अर्जुन को मुक़ाबला करना पड़ा। कुछ स्त्रियों को आभीरों ने लूट लिया।[2] शेष को अर्जुन ने शाल्व देश और कुरु देश में बसा दिया। कृष्णशोकाकुल होकर घने वन में चले गये थे। वे चिंतित हो लेटे हुए थे कि ‘जरा’ नामक एक बहेलिये ने हिरण के भ्रम से तीर मारा। वह बाण श्रीकृष्ण के पैर में लगा, जिससे शीघ्र ही उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया। मृत्यु के समय वे संभवत: 100 वर्ष से कुछ ऊपर थे। कृष्ण के देहांत के बाद द्वापर युग का अंत और कलियुग का आरंभ हुआ।

श्रीकृष्ण के अंत का इतिहास वास्तव में यादव गणतंत्र के अंत का इतिहास है। कृष्ण के बाद उनके प्रपौत्र बज्र यदुवंश के उत्तराधिकारी हुए। पुराणों के अनुसार वे मथुरा आये और इस नगर को उन्होंने अपना केन्द्र बनाया। कहीं-कहीं उन्हें इन्द्रप्रस्थ का शासक कहा गया है।

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धनंजय महाराज मोरे
धनंजय महाराज मोरे
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