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ग
ग्रासूनी भान मान दृश्य द्रष्टा भिन्न
गगन घांस घोंटी सर्व ब्रम्हांडे पोटी
गगन ग्रास घोटीं ब्रह्मांड हें पोटीं
च
छ
ज
ज्या रूपा कारणें वोळंगति सिद्धि
जेथें नाहीं वेदु नाहीं पै शाखा
जेथें न रिघे ठाव लक्षितां लक्षणे
झ
ट
ठ
ड
ढ
त-त्र
तेथे नाही मोल मायाचि गणना अभंग
थ
द
दुभिले द्विजकुळी आलें पैं गोकुळी
ध
न
नसे तो ब्रह्मांडी नसे तो वैकुंठी
न देखों सादृश्य हारपे पैं दृश्य
नव्हें तें पोसणें नव्हे तें साधन
नाही छाया माया प्रकृतीच्या आया
नाहीं त्या आचारु सोंविळा परिवारु
निरकृत्य कृत्य विश्वाते पोखिते
नित्य निर्गुण सदा असणें गोविंदा
नुघडुनिया दृष्टी नामा पाहे पोटी
प
प्राणिया उध्दार सर्व हा श्रीधर
फ
ब
ब्रम्हांड करी हरि ब्रह्म झडकरी
ब्रह्मांड उतरंडी ज्याचे इच्छे घडी
बुद्धि बोध नाहीं क्षमारूप सर्व
भ
भाग्याचेनि भाग्य उदो पै दैवयोगे
भावयुक्त भजतां हरी पावे पूर्णता
म
माता पिता नाहीं बंधु बोध कांही
मी ज्ञानेसि विज्ञान रुपेंसि सज्ञान
य
योगियांचे धन ते ब्रह्म संपन्न अभंग क्र.९५
र
ल
व
वर्ण व्यक्ती सरवे वर्णाश्रम मुखे
विश्वाद्य अनाद्य विश्वरूपे वंद्य
विस्तार विश्वाचा विवेकें पैं साचा
विश्वीं विश्वपती असे पैं लक्ष्मीनाथ विश्वंभरमूर्ति विश्वाचे
ष
श
शांति क्षमा दया सर्वभावें करुणा
स
सर्वांघटी वसे तो आम्हां प्रकाशे
स्वरूप साजणी निद्रिस्त निजलें सारासार धीर निर्गुण परते
स्थिर धीर निर सविचारसार सूर्यातें निवटी चंद्रातें घोंटी
सूर्यातें निवटी चंद्रातें घोंटी
ह
हा पुरुष कीं नारी नव्हे तो रूपस
हें व्यापूनि निराळा भोगी वैकुंठ
क्ष
क्षीराचा क्षीरब्धि क्षरोनिया लोटे
ज्ञ
ज्ञानेसी विज्ञान उन्मनी निमग्न
