ब्रह्म वंश

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मराठा वंश का निर्माण

मराठों का भाषागत या क्षेत्रगत विभाजन नहीं है जैसे ब्राह्मणों तथा राजपूतों में होता है  । मराठा जाति के लिये इसी कारण से सभी क्षेत्र तथा सभी भाषाएं उसकी है  । इसी विशेषता के कारण से विश्व भर के मराठा एक है  । मध्यप्रदेश.  उत्तरप्रदेश.  राजस्थान .  बिहार .  दिल्ली .  गुजरात .  उतरप्रदेश.  कर्नाटक .  तमिलनाडु.  केरल .  बंगाल . उड़िसा आदि क्षेत्रों में मराठा लोग रहते है । इन सभी जगहों पर मराठा लोग राज करने की दृष्टि से पहुँचे तथा वही के स्थानीय नागरिक बन गये  । अपनी मराठा संस्कृति के साथ उसी माटी की संस्कृति व भाषा को अपना लिया  । इस कारण से मराठा जाति के लिये सभी भाषाएँ उनकी अपनी है तथा सभी क्षेत्रीय संस्कृति उनकी अपनी है  ।

• सूर्य वंश –

वंश संख्या 52 ये वंश अपनी विष्णु को अपना आदिपुरुष या मूलपुरुष मानते हैं । वैकुण्ठ का पहला राजा भगवान् विष्णु को ही माना जाता है । इन्हें आदिनारायण भी कहा जाता है तथा इन्हें क्षत्रिय माना गया है । विष्णु का पुत्र ब्रह्मदेव .  ब्रह्मदेव का पुत्र मरीचि मरीचि का पुत्र काश्यप और काश्यप का पुत्र विवस्वान ऊर्फ सूर्य  । इसी सूर्य से सूर्यवंश प्रसूत हुआ  । सूर्य का पुत्र वैवस्त मनु हुआ  ।

• चंद्र (सोम) वंश –

वंश संख्या 40 ब्रह्मदेव का दुसरा पुत्र अत्रि था  । इस अत्रि का पुत्र समुद्र .  समुद्र का पुत्र चंद्र (सोम) .  चंद्र का पुत्र बुध  ।

इस बुध का विवाह वैवस्वत मनु की कन्या इला से हुआ था  । ईला को पृथ्वी माना गया है  । इसी ईला से

उत्पत्र संतति के वंशवृक्ष को चंद्रवंश नाम दिया गया है  ।

• ब्रह्म वंश –

• वंश सख्या 3

सूर्य वंश में ब्रह्मदत्त नामक चक्रवर्ती राजा हो गया  । तबसे उसके वंशजों को ब्रह्मवंश नाम प्राप्त हो गया

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धनंजय महाराज मोरे
धनंजय महाराज मोरे
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