सार्थ सुभाषिते २६ ते ५०

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🌸 सार्थ सुभाषित २६ 🌸
देहे पातिनि का रक्षा यशो रक्ष्यमपातवत् |
नरः पतितकायोऽपि यशःकायेन जीवति ||
अर्थ
[केव्हातरी निश्चितपणे मृत्युमुखी] पडणाऱ्या शरीराच्या रक्षणाबद्दल अतिचिंता कशाला करायची? कीर्तिला जराही धक्का लागणार नाही याची मात्र काळजी घ्यावी. [कारण] मरून गेल्यावरसुद्धा मनुष्य कीर्तिरूपी शरीराने जिवंत राहतो.


🌸 सार्थ सुभाषित २७ 🌸
रविश्चन्द्रो घना वृक्षा नदी गावश्च सज्जनाः।
एते परोपकाराय युगे दैवेन निर्मिताः ॥
अर्थ
देवाने परोपकारासाठीच सूर्य, चंद्र. ढग, झाडे, नद्या, गायी आणि सज्जन लोक या सर्वांची निर्मिति केली आहे.

🌸 सार्थ सुभाषित २८ 🌸
अपूर्वः कोपि कोशोयं विद्यते तव भारति।
व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति संचयात् ।।
अर्थ
हे देवी शारदे, तुझा विद्यांचा खजिना अपूर्व आहे, खर्च करण्याने त्यात भर पडते आणि साठवून ठेवण्याने त्यात घट होते.
आपल्याकडे असलेली विद्या इतरांना देत असतांना ती अधिक पक्की होते आणि कुणालाही न देता आपल्याजवळच राखून ठेवली तर ती विस्मरणात जाऊ शकते.

🌸 सार्थ सुभाषित २९ 🌸
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥५-३ ॥
अर्थ
जो मनुष्य कोणाचा द्वेष करीत नाही आणि कशाची अपेक्षा करीत नाही, तो कर्मयोगी नेहमीच संन्यासी समजावा. कारण राग-द्वेष इत्यादी द्वंद्वांनी रहित असलेला मनुष्य सुखाने संसारबंधनातून मुक्त होतो. ॥ ५-३ ॥

संकलन :- अशोककाका कुलकर्णी

🌸 सार्थ सुभाषित ३० 🌸
अन्नदानं परम् दानं विद्यादानं अत: परम्|
अन्नेन क्षणिका तृप्ति: यावज्जीवं च विद्यया||
अर्थ
अन्नदान हे परम दान आहे. पण विद्यादान हे त्याहूनही श्रेष्ठ आहे.अन्नाने क्षणभर तृप्ति होते, पण विद्येने जीवनभर तृप्ति मिळते.

🌸 सार्थ सुभाषित ३१ 🌸
योऽत्ति यस्य यदा मांसमुभयो: पश्यतान्तरम् |
एकस्य क्षणिका प्रीतिरन्य: प्राणैः वियुज्यते ||
अर्थ
जेव्हा कोणीतरी दुसऱ्याचं [प्राण्याचं] मांस खातो त्यावेळेच्या [परिणामाचा] फरक पहा. एकाला थोडा वेळ मजा येते, पण दुसरा जो (प्राणी) मारला जातो तो कायमचा प्राणांना मुकतो.

🌸 सार्थ सुभाषित ३२ 🌸
सुखं च दुःखं च भवाभवौ च,
 लाभालाभौ मरणं जीवितं च।
पर्यायशः सर्वमेते स्पृशन्ति
तस्माद् धीरो न हृष्येत्र शोचेत् ॥
सुख -दुःख, लाभ -हानि, जीवन -मृत्यु, उत्पति -विनाश -ये सब स्वाभविक कर्म समय -समय पर सबको प्राप्त होते रहते हैं। ज्ञानी पुरुष को इनके बारे में सोचकर शोक नहीं करना चाहिए। ये सब शाशवत कर्म हैं।

🌸 सार्थ सुभाषित ३३ 🌸
न प्रहॄष्यति सन्माने नापमाने च कुप्यति,
न क्रुद्ध: परूषं ब्रूयात् स वै साधूत्तम: स्मॄत:।

जो सम्मान करने पर हर्षित न हों और अपमान करने पर क्रोध न करें, क्रोधित होने पर कठोर वचन न बोलें, उनको ही सज्जनों में श्रेष्ठ कहा गया है।

🌸 सार्थ सुभाषित ३४ 🌸
अस्ति जलं जलराशौ क्षारं तत्किं विधीयते तेन|
लघुरपि वरं स कूपो यत्राकण्ठं जनः पिबति||

यदि किसी बडी जलराशि (जलाशय) का जल खारा(पीने के लिये अयोग्य ) हो तो उसका क्या लाभ? इस से अच्छा तो वह् छोटा सा कुवां है जिस का स्वादिष्ट जल लोग छक कर पीते हैं |

🌸 सार्थ सुभाषित ३५ 🌸
अनित्यानिशरीराणिविभवोनैवशाश्वतः |
नित्यंसंनिहितोमृत्युःकर्तव्योधर्मसङ्ग्रहः ||

इस संसार में समस्तप्राणियोंका जीवन क्षणिक
होता है तथा धन संपत्ति और समृद्धि भी शाश्वत नहीं होती है |मृत्यु भी हर समय उनके प्राणहरण के लिये उद्यत रहती है | ऐसी स्थिति में मनुष्योंका कर्तव्य है कि वह धर्म के सिद्धान्तों को अपना कर उनका पालन करे |

🌸 सार्थ सुभाषित ३६ 🌸
मूकः परापवादे च परदारनिरीक्षेऽप्यन्धः ।
पंगुपरधनहरणे स जयति लोकत्रये पुरुषः ।।

जो दूसरों की चुगली करने में गूँगा हो, जो पर-स्त्रियों को देखने के विषय में अन्धा हो और दूसरों का धन चुराने के विषय में लंगड़ा हो―ऐसा मनुष्य तीनों लोकों में श्रेष्ठ माना जाता है।

🌸 सार्थ सुभाषित ३७ 🌸
आदौ विजित्य विषयान्मोहराग-
द्वेषादिशत्रुगणमाह्रतयोगराज्याः।
ज्ञात्वा मतं समनुभूयपरात्मविद्या-
कांतासुखंवनगृहे विचरन्ति धन्याः ॥

मोह, राग, द्वेष आदि शत्रुरूप विषयों की इच्छा को आरंभ में ही जीत कर, योग के राज्य में आरूढ़ होने वाले, ज्ञान की प्राप्ति और सम्यक् अनुभूति कर के,परा विद्या रूपी पत्नी के साथ वन रूपी गृह में विचरने वाले धन्य हैं ॥

🌸 सार्थ सुभाषित ३८ 🌸
मातृवत्परदारेषुपरदृव्येषुलोष्ट्रवत् |
आत्मवत्सर्वभूतेषुयःपश्यतिसपण्डितः||

जो व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की पत्नियों को अपनी
माता के समान देखता (आदर करता) हो, उनकीधन सम्पत्ती को एक मिट्टी के ढेले के समान तुच्छ समझता हो, औरइस संसार के समस्त जीवित प्राणियों के प्रति आत्मीयता (दयाकी भावना)रखता हो वही व्यक्ति वास्तव मेंपण्डित (सज्जन ) कहलाने योग्य है !

🌸 सार्थ सुभाषित ३९ 🌸
गजभुजङ्गयोरपि बन्धनं
शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनम् |
मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां
विधिरहो बलवानिति मे मतिः ||

हाथी और सांप जो स्वयं में बलवान हैं उन्हें मनुष्यों की कैद में देख कर, सूर्य और चन्द्रमा को भी (राहु और केतु) ग्रहों के द्वारा पीडित होते देख कर, तथा बुद्धिमान् और विद्वान् व्यक्तियों को दरिद्रता में जीवनयापन करते हुए देख कर तो मेरा यही मानना है कि भाग्य ही सबसे अधिक बलवान होता है |

🌸 सार्थ सुभाषित ४० 🌸
विद्वान्प्रशस्यतेलोके,
 विद्वान् सर्वत्रपूज्यते।
विद्ययालभतेसर्वं,
विद्या सर्वत्रपूज्यते ॥

एक विद्वान व्यक्ति की समाज में सर्वत्र प्रशंसा तथा सम्मान होता है। प्राप्त की हुई विद्या और ज्ञान के सदुपयोग से अन्य सभी आवश्यकतायें भी पूरी की जा सकती हैं और इसी कारण से विद्या की सर्वत्र पूजा की जाती है।”

🌸 सार्थ सुभाषित ४१ 🌸
चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु
श्रियाभिजुष्टस्य गृहस्थधर्मे.l
वृद्धो ज्ञातिरवसत्रः कुलीनः
सखा दरिद्रो भगिनी चानपत्या ll

परिवार में सुख-शांति और धन-संपत्ति बनाए रखने के लिए बड़े-बूढ़ों, मुसीबत का मारा कुलीन व्यक्ति, गरीब मित्र तथा निस्संतान बहन को आदर सहित स्थान देना चाहिए । इन चारों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

🌸 सार्थ सुभाषित ४२ 🌸
दानं प्रियवाक्सहितं,ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम्।
वित्तं त्यागनियुक्तं,दुर्लभमेतच्चतुष्टयंलोके॥

मीठे बोल के साथ दान, अहंकाररहित ज्ञान, क्षमायुक्त शौर्य, दान से युक्त धन- ये चार वस्तुएँ संसार में दुर्लभ हैं।

🌸 सार्थ सुभाषित ४३ 🌸
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्तरः कर्तुमिच्छति।
सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते।।

जिस भी कार्य को करने का दायित्व उठायें उसे सिंह की भांति पूरी लगन और साहस के साथ संपन्न करे। किसी भी कार्य का दायित्व लेने से पूर्व मनुष्य को उसके गुण दोषों को भली भाँति समझ लेना चाहिए।

🌸 सार्थ सुभाषित ४४ 🌸
ओज: तेजो बलं प्राणं अमृतं मृत्युमेव च।
तमज्ञाय जनो हेतुं आत्मानं मन्यते जडम्॥

मनुष्य के अन्दर वस्तुत: अपना कुछ है ही नहीं ओज, तेज, बल, शक्ति, जीवन, मृत्यु सब के कारक और कारण परमात्मा ही हैं परन्तु मूर्खता वश मनुष्य परमात्मा की शक्तियों के विना स्वयं जड होते हुए भी स्वयं को कर्ता मान बैठता है।।

🌸 सार्थ सुभाषित ४५ 🌸
नाम्भोधिरर्थितामेति सदाम्भोभिश्च पूर्यते।
आत्मा तु पात्रतां नेय: पात्रमायान्ति संपद:॥

सागर कभी जल के लिए भिक्षा नही मांगता फिर भी वह सदैव जल से भरा रहता है। वह सन्देश देता है कि यदि हम अपने आप को योग्य बना लें तो संसार के सब साधन स्वयं ही हमारे पास आ सकते हैं।

🌸 सार्थ सुभाषित ४६ 🌸
नास्ति कामसमो व्याधि: नास्ति मोहसमं दुखम्।
नास्ति क्रोधसमो वह्नि: नास्ति ज्ञानसमं सुखम्॥

दुनिया में काम के समान कोई रोग नहीं है बाकी रोग तो उपचार के बाद ठीक हो जाते लेकिन यह कामना रूप रोग बढता ही जाता है मोह के समान कोई दुख नहीं है क्योंकि संसार के सारे दुख मोह से ही उत्पन्न होते हैं और क्रोध के समान कोई आग नहीं है जो अपने साथ अपनी सारी दुनिया को जलाता है और सिर्फ दुश्मन और दुश्मनी पैदा करता है और ज्ञान के समान सुख कोई नहीं है जिस से मनुष्य को परं शान्ति सम्मान सुख सम्पत्ति और परं गति सब कुछ प्राप्त होता है।।

🌸 सार्थ सुभाषित ४७ 🌸
अहिंनृपंचशार्दूलंवृद्धंचबालकंतथा ।
परश्वानंचमूर्खंचसप्तसुप्तान्न बोधयेत ॥
सर्प, राजा,शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक,किसीअन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा मूर्ख व्यक्ति.
इन सातो को यदि वे
 निद्रित अवस्था मेंहों तो उनकी निद्रा भङ्गकर जगाना नहीं चाहिये |

🌸 सार्थ सुभाषित ४८ 🌸
सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यंसत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।
सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्ना:।।
सत्य जिनका व्रत है, जो सत्यपरायण, तीनों कालमें सत्य, सत्य (भाव)स्वरुप, संसार के उद्भव स्थान और अन्तर्यामीरुपसे सत्य (संसार )में निहित हैं तथा सत्य और ऋत जिनके नेत्र हैं उन सत्य के सत्य आप सत्य स्वरुप की हम शरण हैं।।

🌸 सार्थ सुभाषित ४९ 🌸
दानं भोगो नाश: तिस्रो,गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते, तस्य तॄतीया गतिर्भवति ll

धन खर्च होने के तीन मार्ग हैं -दान, उपभोग तथा विनाश । जो व्यक्ति न तो दान करता है तथान ही धन का उपभोग करता है, अन्ततः उसके धन का न केवल विनाश होता है, अपितु वह धन जाते जाते रोग, शोक, भय आदि अनेकों कष्टभी देकर जाता है.

🌸 सार्थ सुभाषित ५० 🌸
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते,आयुर्विद्या यशो बलम्।।

जो व्यक्ति हर रोज अपने बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम व चरणस्पर्श कर उनकी सेवा करता है। उसकी उम्र, विद्या,ज्ञान यश और शक्ति लगातार बढ़ती जाती है।

🌸 सार्थ सुभाषित ५१ 🌸
मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः।
भिनत्ति वाक्यशूलेन अदृश्ययं कण्टकं यथा ।

मूर्ख व्यक्ति को दो पैरोंवाला पशु समझकर त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह अपने शब्दों से शूल के समान उसी तरह भेदता रहता है, जैसे अदृश्य कांटा चुभ जाता है|

🌸 सार्थ सुभाषित ५२ 🌸
अतिवादंनप्रवदेत्रवादयेद्,यो नाहतः प्रतिहन्यात्र घातयेत्।
हन्तुं च यो नेच्छति पातकं वै, तस्मै देवाः स्पृहयन्त्यागताय ॥
जो न किसी को बुरा कहता है, न कहलवाता है; चोट खाकर भी न तो चोट करता है, न करवाता है, दोषियों को भी क्षमा कर देता है -देवता भी उसके स्वागत में पलकें बिछाए रहते हैं।

🌸 सार्थ सुभाषित ५३ 🌸
सर्वार्थसंभवो देहो जनित: पोषितो यत: ।
न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मत्र्य: शतायुषा॥

सौ वर्ष की आयु प्राप्त करके भी माता-पिता के ऋण से उऋण नही हुआ जा सकता । वास्तव में जो शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का प्रमुख साधन है, उसका निर्माण तथा पालन-पोषण जिनके द्वारा हुआ है, उनके ऋण से मुक्त होना कठिन ही नही, सर्वथा असम्भव है ।



🌸 सार्थ सुभाषित ५४ 🌸
दानं प्रियवाक्सहितं,ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम्।
वित्तं त्यागनियुक्तं,दुर्लभमेतच्चतुष्टयंलोके॥

मीठे बोल के साथ दान, अहंकाररहित ज्ञान, क्षमायुक्त शौर्य, दान से युक्त धन- ये चार वस्तुएँ संसार में दुर्लभ हैं।



🌸 सार्थ सुभाषित ५५ 🌸
सर्वार्थसंभवो देहो जनित: पोषितो यत: ।
न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मत्र्य: शतायुषा॥

सौ वर्ष की आयु प्राप्त करके भी माता-पिता के ऋण से उऋण नही हुआ जा सकता । वास्तव में जो शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का प्रमुख साधन है, उसका निर्माण तथा पालन-पोषण जिनके द्वारा हुआ है, उनके ऋण से मुक्त होना कठिन ही नही, सर्वथा असम्भव है ।




🌸 सार्थ सुभाषित ५६ 🌸
दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञानतानाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥

दान दरिद्रता को नष्ट कर देता है । शील स्वभाव से दुःखों का नाश होता है । बुद्धि अज्ञान को नष्ट कर देती है तथा भावना से भय का नाश हो जाता है ।

🌸 सार्थ सुभाषित ५७ 🌸
भद्रंभद्रंकृतंमौनंकोकिलैर्जलदागमे ।
वक्तारो दर्दुरायत्रतत्रमौनंसमाचरेत्।।

अरी कोयलो ! तुमनेयह बहुत अच्छा किया कि वर्षा ऋतु के आगमन पर तुमने मौन धारण कर लिया है। जिस स्थान पर मेंढकटर्रा रहे हों वहां मौन धारण करनाही उचित है।

🌸 सार्थ सुभाषित ५८ 🌸
दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञानतानाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥

दान दरिद्रता को नष्ट कर देता है । शील स्वभाव से दुःखों का नाश होता है । बुद्धि अज्ञान को नष्ट कर देती है तथा भावना से भय का नाश हो जाता है ।



🌸 सुभाषित ५९ 🌸
घोररूपे महारावे सर्वशत्रुभयङ्करि ।
भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणागतम् ।।

भयानक रूपवाली, घोर निनाद करनेवाली, सभी शत्रुओंको भयभीत करनेवाली तथा भक्तोंको वर प्रदान करनेवाली हे देवी ! आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें।



🌸 सार्थ सुभाषित ६०🌸
ॐ पूर्णमदं पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
वह परमेश्वर पूर्ण है, यह दृश्यमान जगत् भी स्वसत्ता में सर्वथा पूर्ण है, पूर्णस्वरूप भगवान् से ही यह पूर्ण जगत् उदय होता है। उस परम् पूर्ण परमेश्वर का पूर्ण स्वरूप लिए जाने पर भी अनन्त महिमामय भगवान् सर्वत्र पूर्ण ही रह जाता है, वह कदापि खण्डित नहीं होता। हम उसी पूर्ण परमात्मा की उपासना करें, अन्य की कदापि नहीं।


🌸 सार्थ सुभाषित ६१ 🌸
केचिद् वदन्ति धनहीन जनो जघन्यः,
केचिद् वदन्ति गुणहीन जनो जघन्यः ।
व्यासो वदत्यखिल वेद विशेष विज्ञः,
नारायणस्मरणहीन जनो जघन्यः।।
महर्षि वेदव्यास कह रहे हैं कि, कुछ विद्वान कहते हैं कि धन के बिना मनुष्य का जीवन बेकार है, तो कुछ के अनुसार गुण के बिना मनुष्य जीवन को धिक्कार है। वे पुनः आगे कहते हैं कि कोई कुछ भी कहे परन्तु मेरे अनुसार तो वस्तुतः जगत के कारण, परमपिता परमात्माके स्मरण से विहीन मनुष्य-जीवन ही धिक्कार का पात्र है.



🌸 सुभाषित ६२ 🌸
न ह्मम्मयानि तीर्थानि न देवा मॄच्छिलामया: |
तेपुनन्त्युरूकालेनदर्शनादेव साधव: ||
नदियों का पवित्र जल या भगवान की मूर्ति के दर्शन मात्र से भक्त का मन शुद्ध नहीं होता अपितु लंबे समय ध्यान लगाने के बाद ही अंत:करण शुद्ध होता है। परन्तु संतों के केवल दर्शन मात्र से ही हम पवित्र हो जाते है।



🌸 सुभाषित ६३ 🌸
न ह्मम्मयानि तीर्थानि न देवा मॄच्छिलामया: |
तेपुनन्त्युरूकालेनदर्शनादेव साधव: ||

नदियों का पवित्र जल या भगवान की मूर्ति के दर्शन मात्र से भक्त का मन शुद्ध नहीं होता अपितु लंबे समय ध्यान लगाने के बाद ही अंत:करण शुद्ध होता है। परन्तु संतों के केवल दर्शन मात्र से ही हम पवित्र हो जाते है।सुभाषिते

🌸 सुभाषित ६४ 🌸
इंद्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतींद्रियम् |
तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृते: पादादिवोदकम् ||

अर्थ :- पखालीला एक छिद्र पडलें तरी त्यांतून जसें हळूहळू सर्व पाणी निघून जातें , तसें इंद्रियांतून एक इंद्रिय जरी विषयासक्त झाले तरी त्या द्वारें हळूहळू मनुष्याची बुद्धि नष्ट होते.
संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏

🌸 सुभाषित ६५ 🌸
शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपो
नागेन्द्रो निशताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।
व्याधिर्भेषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषम्
सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्।।

आग को पानी से बुझाया जा सकता है,
सूर्य की तीव्र धूप को छाते से रोका जा सकता है,
मतवाले हाथी को तीक्ष्ण अङ्कुश से वश में किया जा सकता है।
सांड और गधे को डंडे से रोका जा सकता है,
भयंकर रोग को दवाओं से दूर किया जा सकता है,
तथा विष अनेन प्रकार के मंत्रों के प्रयोग से उतारा जा सकता है।
इस प्रकार संसार में सब की दवा शास्त्रों में विहित है,
*किंतु मूर्ख को उचित मार्ग पर लाने के लिए अथवा उसकी मूर्खता दूर करने के लिए कोई दवा नहीं है।*

*Today’s Thought:*
The boldness
to think is easy,
to act is hard,
but the hardest thing in the world is
to act in accordance with ur thinking.
try it once & see the difference.
संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏

🌸 सुभाषित ६६ 🌸
वॄत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत:॥

We should guard our character attentively; money can come and go. If money is lost, nothing is lost but if character is lost, everything is lost.

चरित्र की प्रयत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिए, धन तो आता-जाता रहता है। धन के नष्ट हो जाने से व्यक्ति नष्ट नहीं होता पर चरित्र के नष्ट हो जाने से वह मरे हुए के समान है।

संग्रह: धनंजय महाराज मोरे🙏

🌸 सुभाषित ६७ 🌸
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कांता न दुभाषिणी
सन्मित्रं सुधनं स्वयोषिति रतिश्चाज्ञापराः सेवकाः।
आतिथ्यं शिवपूजनं  प्रतिदिनं  मृष्टान्नपानं   गृहे
साधोःसङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥

भावार्थ:
घरात प्रत्येक जण आनंदी आहे, मुलगा हुशार आहे, पत्नी मितभाषी आणि सुंदर आहे, सज्जन मित्र आहेत, पती आपल्या पत्नीशी एकनिष्ठ आहे, नोकर आज्ञाधारक आहेत, दररोज जेथे अतिथिंचा आदरसत्कार आणि भगवान शंकराची उपासना, होते. शुध्द सात्विक भोजन दररोज बनते. असा गृहस्थाश्रम धन्य आहे.

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धनंजय महाराज मोरे
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