सब ब्रजनारी सुनो हरि
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सब ब्रजनारी सुनो हरि जनमो नंद-जसोदा पेट ।
चलवो चल उस हरिकु देखे मिल निकलत है थाट ॥१॥
नारी आरती कर लें गावत नाम संगसे लागा छंद ।
हरदिर तेल लिये करमाहे मिलने चालत गोबिंद ॥२॥
अपने अपने घर तोरन गुरिया धरत है जनमे सुत ।
नंद का भाग कोई न जाने भेटी होवे अनंत ॥३॥
घर घर गावत राग रागिनी ठोर ठोर भयी भार ।
वो सुख कहॉं कहूं अपने मुखसे आवे न जाने पार ॥४॥
द्विज जन नारी मंगल गावत चीर लुटावे भाट ।
गौ, धरति और सुन्ना दान करत हे बाट ही बाट ॥५॥
कुंकुम केसर चोवा-चंदन फूल गुलालकी शोभा ।
देखत इंद्र फणेंद्र महेंद्र गावत है सब रंभा ॥६॥
नाद न भेरी तालही जब घट नादमें अंबर गाजे ।
नाना सूर बजावत छंदे ढोल दमामें बाजे ॥७॥
बहेणि कहे हरिजनम को सुख कहा कहूं हरि जाने ।
छंद प्रबंध सुनावत नारी देहभाव नहीं जाने ॥८॥
