कंटक को मल्लमर्द ।
374.
कंटक को मल्लमर्द ।
दैतन को सिर छेद ।
सुत तेरो नंद कृष्ण ।
सोही जानी है ॥१॥
गोपिकाको प्राणनाथ ।
भक्तन कु करे सनाथ ।
शास्तर की ऐसी बात ।
संत जानी है ॥२॥
धर्म कु रक्षण आयो ।
पापकु सब डारि दियो है ।
वोही कृष्ण सुत भयो ।
बात ये सत्य मानी है ॥३॥
सुत मत कहो नंद ।
ब्रह्म सो येहि गोविम्द है ।
बहेणि भाट का प्रबंध ।
सत्य सुजानि है ॥४॥
