ये गोविंद प्राप्त भय
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ये गोविंद प्राप्त भयो कहा काज ।
व्रत नहि जानूं तप नहि जानूं कारागृहमें बिराज ॥१॥
पूरब जनम तप करत है तब बरद मिलो बनमाली ।
मेरे पेटमें प्रगटो निरगुन येही मॉंगत बाली ॥२॥
बहुतहि निकट मॉंडी तब हरि करूनाकर कहे जान ।
तीन जनममें मेरे उदरमें आऊ बरद दियो उस रात ॥३॥
उस तप के लीये उदर सु आवे जनम गये पीछे दोन ।
तीजो जनम यो कृष्ण भयो है वोही तपके कारन ॥४॥
तपव्रतदान बिन बिहिन सेवा कृष्ण न आवे संग ।
संग बिना नहि मुक्ति जिवाकूं येही कहत श्रीरंग ॥५॥
बहेणि कहे उस वसुदेव-देवकीकु देव मुक्ति ।
वयसों तप बिन प्राप्त नही वो साधूकी संगती ॥६॥
