राग काफी
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राग काफी
घर आंगण न सुहावै, पिया बिन मोहि न भावै॥
दीपक जोय कहा करू सजनी, पिय परदेस रहावै ।
सूनी सेज जहर ज्यू लागे, सिसक-सिसक जिय जावै॥
नैण निंदरा नही आवै॥
कदकी उभी मै मग जोऊं, निस-दिन बिरह सतावै ।
कहा कहू कछु कहत न आवै, हिवड़ो अति उकलावै॥
हरि कब दरस दिखावै॥
ऐसो है कोई परम सनेही, तुरत सनेसो लावै ।
वा बिरिया कद होसी मुझको, हरि हंस कंठ लगावै॥
मिरा मिलि होरी गावै॥
