प्रभु तुम कैसे दीनदय
184.
प्रभु तुम कैसे दीनदयाळ॥धृ०॥
मथुरा नगरीमो राज करत है बैठे । नंदके लाल॥१॥
भक्तनके दुःख जानत नही । खेले गोपी गवाल॥२॥
मिरा कहे प्रभू गिरिधर नागर । भक्तनके प्रतिपाल॥३॥
184.
प्रभु तुम कैसे दीनदयाळ॥धृ०॥
मथुरा नगरीमो राज करत है बैठे । नंदके लाल॥१॥
भक्तनके दुःख जानत नही । खेले गोपी गवाल॥२॥
मिरा कहे प्रभू गिरिधर नागर । भक्तनके प्रतिपाल॥३॥