हरिबिन रहिया न जाये
183.
हरिबिन रहिया न जाये जिहिरा । कबकी ठाडी देखे राहा ॥१॥
क्या मेरे लाल कवन चुकी भई । क्या मोहिपासिती बेर लगाई ॥धृ॥
कोई सखी हरी जावे बुलावन । बार हि डारू उसपर तन ॥२॥
तुका प्रभु कब देखे पाऊ । पासी आऊ फेर न जाऊ ॥३॥
183.
हरिबिन रहिया न जाये जिहिरा । कबकी ठाडी देखे राहा ॥१॥
क्या मेरे लाल कवन चुकी भई । क्या मोहिपासिती बेर लगाई ॥धृ॥
कोई सखी हरी जावे बुलावन । बार हि डारू उसपर तन ॥२॥
तुका प्रभु कब देखे पाऊ । पासी आऊ फेर न जाऊ ॥३॥