चाकर राखो जी ।
46.
चाकर राखो जी ।
चाकर राखो जी गिरधर लाल ।
चाकर रहूँ बाग लगाऊँ,
नित उठ दरसन पाऊँ ।
वृंदावन की कुंज गलिन में,
गोविंद लीला गाऊँ ।
चाकरी मे दरसन पाऊँ,
सुमिरन पाऊँ खरची ।
भाव भगति जागीरी पाऊँ,
तीनू बाता सरसी ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर,
चाकर राखो जी ।
