मै हरि बिन क्यो जिऊ
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मै हरि बिन क्यो जिऊ री माइ॥
पिव कारण बौरी भई, ज्यू काठहि घुन खाइ॥
ओखद मूल न संचरै, मोहि लाग्यो बौराइ॥
कमठ दादुर बसत जल मे जलहि ते उपजाइ ।
मीन जल के बीछुरे तन तलफि करि मरि जाइ॥
पिव ढूंढण बन बन गई, कहु मुरली धुनि पाइ ।
मिरा के प्रभु लाल गिरधर मिलि गये सुखदाइ॥
