गोबिन्द कबहु मिलै पि
71.
गोबिन्द कबहु मिलै पिया मेरा॥
चरण कंवल को हंस हंस देखूं, राखू नैणा नेरा ।
निरखणकू मोहि चाव घणेरो, कब देखू मुख तेरा॥
व्याकुल प्राण धरत नहि धीरज, मिल तू मीत सबेरा ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर ताप तपन बहुतेरा॥
71.
गोबिन्द कबहु मिलै पिया मेरा॥
चरण कंवल को हंस हंस देखूं, राखू नैणा नेरा ।
निरखणकू मोहि चाव घणेरो, कब देखू मुख तेरा॥
व्याकुल प्राण धरत नहि धीरज, मिल तू मीत सबेरा ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर ताप तपन बहुतेरा॥