पपैया रे!
43.
पपैया रे!
पपैया रे पिव की वाणी न बोल ।
तेरी बोली सुनत ही सखी री,
विरह बढ़त अनमोल ।
प्रीतम बिन मोहे चैन न आवै,
मन भयो डांवाडोल ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर,
दरसन दे अनमोल ।
43.
पपैया रे!
पपैया रे पिव की वाणी न बोल ।
तेरी बोली सुनत ही सखी री,
विरह बढ़त अनमोल ।
प्रीतम बिन मोहे चैन न आवै,
मन भयो डांवाडोल ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर,
दरसन दे अनमोल ।