होरी खेलत है गिरधारी
44.
होरी खेलत है गिरधारी ।
मुरली चंग बजत डफ न्यारी,
संग जुवति ब्रज नारी ।
चंदन केसर छिरकत मोहन,
अपने हाथ बिहारी ।
फागुन फाग मच्यो है भारी,
कोई नारी कोई नर झारी ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर,
मोहे लाग्यो प्यारी ।
44.
होरी खेलत है गिरधारी ।
मुरली चंग बजत डफ न्यारी,
संग जुवति ब्रज नारी ।
चंदन केसर छिरकत मोहन,
अपने हाथ बिहारी ।
फागुन फाग मच्यो है भारी,
कोई नारी कोई नर झारी ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर,
मोहे लाग्यो प्यारी ।