॥ जय देवी जय देवी जय
4.
॥ जय देवी जय देवी जय महालक्ष्मी ॥
॥ श्री दुर्गायाः आरतिः ॥
(मूल मराठी- दुर्गे दुर्घट भारी)
दुर्गे सुदुर्गमोऽस्ति त्वदृते संसारः
अनाथनाथे अम्बे अस्तु कृपाप्रसरः ।
वारय वारय जननम् मरणम् वारय मे
अस्मि विपत्तिषु पतितो मातस्तारय मे ॥ १॥
॥ जय देवि जय देवि ॥
जय देवि जय देवि महिषासुरमथिनि ।
सुरवर- ईश्वर- वरदे संजीवनि तारिणि ॥धृ॥
त्रिभुवन- भुवने नाऽन्या भजते त्वत्साम्यम्
वेदचतुष्कम् श्रान्तम् त्वाम् स्तोतुम् अशक्तम् ।
विवदत् प्रवाहपतितम् षट्शास्त्राधारम्
किन्तु त्वम् भक्तेषु प्रसीदसि क्षिप्रम् ॥ २॥
॥ जय देवि जय देवि ॥
प्रसन्न- वदने दासे प्रसीदसि त्वरितम्
क्लेशान् मोचय मातश्छेदय भवपाशम् ।
अम्बे त्वदृते को माम् कुर्यात् पूर्णाशम्
नरहरि- मन आस्ते तव पदपंकजलीनम् ॥ ३॥
॥ जय देवि जय देवि ॥
॥ जय जय दुर्गे जगदम्बे ॥ भक्तान् तारय हे अम्बे ॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥
