आयी देखत मनमोहनकू, म
26.
आयी देखत मनमोहनकू, मोरे मनमो छबी छाय रही॥धृ०॥
मुख परका आचला दूर कियो । तब ज्योतमो ज्योत समाय रही॥२॥
सोच करे अब होत कंहा है । प्रेमके फुंदमो आय रही॥३॥
मिरा के प्रभु गिरिधर नागर । बुंदमो बुंद समाय रही॥४॥
26.
आयी देखत मनमोहनकू, मोरे मनमो छबी छाय रही॥धृ०॥
मुख परका आचला दूर कियो । तब ज्योतमो ज्योत समाय रही॥२॥
सोच करे अब होत कंहा है । प्रेमके फुंदमो आय रही॥३॥
मिरा के प्रभु गिरिधर नागर । बुंदमो बुंद समाय रही॥४॥