आली रे मेरे नैणा बाण
27.
आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी ।
चित्त चढ़ो मेरे माधुरी मूरत उर बिच आन अड़ी ।
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ अपने भवन खड़ी ॥
कैसे प्राण पिया बिन राखूँ जीवन मूल जड़ी ।
मिरा गिरधर हाथ बिकानी लोग कहै बिगड़ी ॥
27.
आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी ।
चित्त चढ़ो मेरे माधुरी मूरत उर बिच आन अड़ी ।
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ अपने भवन खड़ी ॥
कैसे प्राण पिया बिन राखूँ जीवन मूल जड़ी ।
मिरा गिरधर हाथ बिकानी लोग कहै बिगड़ी ॥