राम मिलण के काज सखी,
25.
राम मिलण के काज सखी, मेरे आरति उर मे जागी री ।
तड़पत-तड़पत कल न परत है, बिरहबाण उर लागी री ।
निसदिन पंथ निहारूँ पिवको, पलक न पल भर लागी री ।
पीव-पीव मै रटूँ रात-दिन, दूजी सुध-बुध भागी री ।
बिरह भुजंग मेरो डस्यो कलेजो, लहर हलाहल जागी री ।
मेरी आरति मेटि गोसाईं, आय मिलौ मोहि सागी री ।
मिरा ब्याकुल अति उकलाणी, पिया की उमंग अति लागी री ।
