जो सुख होत गोपालहि ग
2.
जो सुख होत गोपालहि गाये । जो नही होत किये जपतपके, कोटिक तीरथ न्हाये ॥
दिये लेत नही चारि पदारथ, चरनकमल चित्त लाये ।
तीनी लोक तृणसमकरि लेखत, नद नंदन उर आये ।
बंसीबट बृंदावन जमुना, तजि बैकुंठ्को जाये ।
सूरदास हरिको सुमिरन करि, बहुरि न भाव चलि आये ॥
