भज मन रामचरण सुखदाई
3.
भज मन रामचरण सुखदाई ॥धृ॥
जिही चरननसे निकसी सुरसरी संकर जटा समाई ।
जटासंकरी नाम पऱ्यो है त्रिभुवन तारन आई ।
जिन चरणनकी चरणपादुका भरत रह्यो लव आई ।
सोई चरण केवट धोईलीने तब हरिनाव चलाई ।
सोई चरन संतन जन सेवत सदा रहत सुखदाई ।
सोई चरन गौतमनारी परसि परमपद पाई ॥
दंडक बन प्रभु पावन किन्हो ऋषियनत्रास मिटाई ।
सोई प्रभु त्रिलोकके स्वामी कनकमृगा सग धाई ॥
कपि सुग्रीव बंधुभय ब्याकुल तिन जय छत्र फिराई ।
रिपुको अनुज विभीषण निसिचर परसत लंका पाई ॥
शिव सनकादिक अरु ब्रम्हादिक सेष सहस्त्र मुख गाई ।
तुलसीदास मारुत सुतकी प्रभु निजमुख करत बडाई ॥
