हरि तुम हरो जन की भी
2.
हरि तुम हरो जन की भीर ।
द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढायो चीर॥
भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप शरीर ।
हिरणकश्यपु मार दीन्हों, धरयो नाहिंन धीर॥
बूडते गजराज राखे, कियो बाहर नीर ।
दासि 'मिरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥
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हरि तुम हरो जन की भीर ।
द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढायो चीर॥
भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप शरीर ।
हिरणकश्यपु मार दीन्हों, धरयो नाहिंन धीर॥
बूडते गजराज राखे, कियो बाहर नीर ।
दासि 'मिरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥