मग व्यासपुजा सारिली
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मग व्यासपुजा सारिली | तैसीच वाल्मिकाची केली | वसिष्ठादिकी अंगिकारिली |समस्त ऋषि पूजियले ॥१॥
धन्य धन्य धरातळी | घेऊनिया देवी सकळी | माजी सहित वनमाळी | आळंकापुरी नगरीये ॥२॥
मग साठी तीनशे गंगा | माजी शिव द्वादश लिंगा |अष्टोत्तर तीर्थे समर्थे पै गा | तिही स्तवन आरंभिले ॥३॥
कोटी तीर्थांचा रहिवास | अष्टभैरव सावकास | वसू कोटि गणेश | साठीसहस्त्र गणासहित ॥४॥
ऐसे रहिवासले षण्मास | दिव्यद्रुमफळे प्रतिदिवस | दिव्य अन्ने सावकाश | अम्रृत भक्षिती देव ॥५॥
ऐसा सकळ तीर्थांचा मेळा | तयामाजी परब्रह्म पुतळा | करी ज्ञानदेवाचा सोहळा | आळंकापुर नगरिये ॥६॥
गरुड हनुमंता ऐसे |पुढे कामारी हृषिकेशें|साक्षात वसिजे महेशे |गौरीसहित आळंकापुरी ॥७॥
श्रृंगी त्राहाटण |प्रतिदिनी विभूतींचे उधळण | जयजय शंकर शिव पूर्ण I ऐंशी स्तोत्रे गाताती ॥८॥
महा सभास्थळ वैकुंठ | सभे श्रेष्ठ वैकुंठपीठ | आणि शिवमूर्ती घनदाट | नीळकंठ सभेसी ॥९॥
रंभा उर्वशी नाचती | नारद तुंबर वीणे वाती | गणेश सारजा आळविती | सा राग एकवीस मूर्च्छना ॥१०॥
ऐसा रंग स्थिरावला | जयजयकारे घोष केला | तेणे चवकोनि उठला | पाताळींचा शेष ॥११॥
ऐकोनी विष्णुकीर्तन | तयासी आले पै स्फुंदन | मग उच्चारित रामकृष्ण | म्रुत्युलोकासि आला ॥१२॥
सहस्त्र वदने स्तुति करी | हर नमस्कारिले हरी | वाहुनि तुळसीमंजिरी | ज्ञानदेवा पूजियले ॥१३॥
नामा म्हणे ज्ञानउदयो | ज्ञानदेवा भाग्याचा पहा हो | आपण येऊनि वैकुंठरावो | समाधि दिधली निजहस्ते ॥१४॥
