हमे कैशी घोर उतारो ।
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हमे कैशी घोर उतारो । द्रग आंजन सबही धोडावे ।
माथे तिलक बनावे पेहरो चोलावे॥१॥
हमारो कह्यो सुनो बिष लाग्यो । उनके जाय भवन रस चाख्यो ।
उवासे हिलमिल रहना हासना बोलना॥२॥
जमुनाके तट धेनु चरावे । बन्सीमे कछु आचरज गावे ।
मीठी राग सुनावे बोले बोलना॥३॥
हामारी प्रीत तुम संग लागी । लोकलाज कुलकी सब त्यागी ।
मिराके प्रभु गिरिधारी बन बन डोलना॥४॥
