राजा थारे कुबजाही मन
226.
राजा थारे कुबजाही मन मानी । म्हांसु आ बोलना॥धृ०॥
रसकोबी हरि छेला हारियो बनसीवाला जादु लाया ।
भुलगई सुद सारी॥१॥
तुम उधो हरिसो जाय कैहीयो । कछु नही चूक हमारी॥२॥
मिराके प्रभु गिरिधर नागर । चरण कमल उरधारी॥३॥
226.
राजा थारे कुबजाही मन मानी । म्हांसु आ बोलना॥धृ०॥
रसकोबी हरि छेला हारियो बनसीवाला जादु लाया ।
भुलगई सुद सारी॥१॥
तुम उधो हरिसो जाय कैहीयो । कछु नही चूक हमारी॥२॥
मिराके प्रभु गिरिधर नागर । चरण कमल उरधारी॥३॥