पग घुंगरु रे पग घूंग
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पग घुंगरु रे पग घूंगरु बांधकर नाची ॥धृ॥
मै अपने तो नारायणकी । हो गयी आपही दासी ॥१॥
विषका प्याला राजाजीने भेजा । पीबत मीरा हासी ॥२॥
लोग कहे मीरा भई रे बावरी । बाप कहे कुल नासी ॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधन नागर । हरिचरणकी दासी ॥४॥
