दर बरागने मुह बसकिनी
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दर बरागने मुह बसकिनी । पंच हुकामिट नावो ।
सतर दोय भरे अमृत सर । बिखको मार कठावो ॥१॥
पाछे बहुरन आवन पावो । अमृत बानी घटते उचरो आत्मको समझावो ॥२॥
बजर कुठार मोहे हरी छीना । मिनत लग पावो । संतनके हम उलटे सेवक । भगत न ते डर पावो ॥३॥
हितकर भगत करे जो जन तिन भव सगल चुकाई ये । कहत नामदेव बाहर क्या भरमो । इत संजम हर पाईये ॥४॥
