गहेरी करके बिन खुदाई
९३.
गहेरी करके बिन खुदाई । उपर मंडप छाये मारकंडे ते कवन काई ॥१॥
जीन तीर्णधर मूड बुलाए । हमरो कर्ता राम सनेही । काहेरे नर गर्व करत है । बिनस जाय कूठी देही ॥२॥
मेरी मेरी कयरो करते दूर जो धनसे भाई । बारह जो जन छत्र चलेथा । देही गिरजन खाई ॥३॥
सब सोनेकी लंका होती । रावणसे अदकाई । कहाभयो दरबाधे हाती खीनमे भई पराई ॥४॥
दुर्वासासो करत ठगोरी जादव यह फल पाये । किरपा करी जिन अपने उपर । नामदेव हर गन गाये ॥५॥
