भजु मन चरन कँवल अविन
151.
भजु मन चरन कँवल अविनासी ।
जेताइ दीसे धरण-गगन-बिच, तेताई सब उठि जासी ।
कहा भयो तीरथ व्रत कीन्हे, कहा लिये करवत कासी ।
इस देही का गरब न करना, माटी मै मिल जासी ।
यो संसार चहर की बाजी, साँझ पडयाँ उठ जासी ।
कहा भयो है भगवा पहरयाँ, घर तज भए सन्यासी ।
जोगी होय जुगति नहि जाणी, उलटि जनम फिर जासी ।
अरज करूँ अबला कर जोरें, स्याम तुम्हारी दासी ।
मिरा के प्रभु गिरिधर नागर, काटो जम की फाँसी ।
