राग कामोद
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राग कामोद
बरजी मै काहूकी नाहि रहू ।
सुणो री सखी तुम चेतन होयकै मनकी बात कहूं॥
साध संगति कर हरि सुख लेऊ जगसू दूर रहू ।
तन धन मेरो सबही जावो भल मेरो सीस लहूं॥
मन मेरो लागो सुमरण सेती सबका मै बोल सहू ।
मिरा के प्रभु हरि अविनासी सतगुर सरण गहूं॥
