वारकरी रोजनिशी

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वारकरी रोजनिशी › 5. संत एकनाथ महाराज › 1. संत एकनाथ अभंग गाथा › 1. संत एकनाथ अभंग गाथा › 257. गारुडी ३९४१ ते ३९४६

चल चल चल । निरंजन जं

🙏 5. संत एकनाथ महाराज · ABH-090359 · अभंग क्र. ३९४६

3946.
चल चल चल । निरंजन जंगलकाआया खिलारी । लिया हातो मे खेल पेटारी । कालीकल वाहामो डारी । सबका मुसासाब घुसारी । हा हा हा हा । चुप बैठ चुप बैठ । हां नही हुं नहीं । कछु नाद बिंजु कला जोती । आदी मदी अंती कडूंनही । चुप बैठ चुप बैठ । आपने जगा चुप बैठ । कहना तो कहना मनही बैठे आराम । आलखमोंलखलखमो आलख । तो होना एक लख लख । एहन्नरा मेरे गुरूपरवरनें बताया । आहां ब्रह्म मैदानछोटेमें बडा मारी । अरे बाजेगार खडा । ढो ढो ढोढो । सोहो सोहो । ढोल पीटते हैं । नाथ गारूडीबीर पुरा है । ओ खेलका वो खेल करते है । ओप्रेम पोंगडा हांडीबाग बडा है । आवे हांडीबाग तूंबता शिका है । बाबा मैने तो खेलका खेलगट कराहै । और तेरे नानीका शीर काला । आरे हांडीबाग । तो आहाजी तू क्या क्या खेल सिका है । और कछुने खेल खेले मा । तो आहाजी । गुरू पीर पैंगबरकीयाद कर । तो आहाजी । नजर कर नजर कर । ज्या के व्हां सबके आखर होत है । उसमें सबकीपैदास है चल चल चल । ये देख राधा मावशी तेरेसेनचत है । क्या क्या खेल तेरेसे करत है । ले इसेडारू । और ऐसा खेल खेलुके । हमारे बडे बडेखेलते है । ये देखो हीरे की खानी निकालत है । आवल्ल फतरा । फेर हिरा फेर देखो तो फतरा काफतरा । तीन लोककु बुजे नही । समज पडके गत्याहोने नहीं । सौंसारकें बजारमें बडे बडे डुबतें हैं । ये देखो रूपया बनते हैं । आधल एक।एकके दोन । दोनके तीन । तीनके चार । चारके पांच । पांचकेपचीस बनाया । पांच पांच मिल गये । हामआकेलाका आकेला रहया । चल चल चल । निरंजनजंगलसे बड़ा आया । ब्रह्म भवजीपडा निखरत हैं । फडाके महजथमे धुस धुस फुस फुस करत है । ले इसेबे डारू और ऐसा खेल खेलू । खेलकु बड़ेबडे दाता देखते है । चल चल चल चीपडीके पोंगडे । बड्या बड्या बाता करत है । बड़े बड़े तो भागगये । तेराही ब्रीद छीन लेऊंगा । तेरे मूंपर मारूंगा । तेरी म्हातारी रोवेगी । येह भेदर तो देख भला । आलललल । सब जगो मे उज्याला । मै आपआपनेसे भुला । ये कछु नहीं देख । ये हुन्नेर तोसबसे अच्छा है । चल चल चल अव्वल एक । एककेदो । दोके तीन । तीनके चारा चारके पांच । पांचकेपचीस । पचीसके छत्तीस । छत्तीसके चालीस । चालीसके ऐंशी । एकळू नही देख । एका जनार्दनकेपाव पकडकर बैठा है । सदोदित नाम गावतहै ॥१॥

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