मोरी लागी लटक गुरु च
201.
मोरी लागी लटक गुरु चरणकी॥धृ०॥
चरन बिना मुज कछु नही भावे । झूंठ माया सब सपनकी॥१॥
भवसागर सब सुख गयी है । फिकीर नही मुज तरुणोनकी॥२॥
मिरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । उलट भयी मोरे नयननकी॥३॥
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मोरी लागी लटक गुरु चरणकी॥धृ०॥
चरन बिना मुज कछु नही भावे । झूंठ माया सब सपनकी॥१॥
भवसागर सब सुख गयी है । फिकीर नही मुज तरुणोनकी॥२॥
मिरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । उलट भयी मोरे नयननकी॥३॥