राग कजरी
106.
राग कजरी
म्हारा ओलगिया घर आया जी ।
तन की ताप मिटी सुख पाया, हिल मिल मंगल गाया जी॥
घन की धुनि सुनि मोर मगन भया, यू मेरे आनंद छाया जी ।
मग्न भई मिल प्रभु अपणा सूं, भौका दरद मिटाया जी॥
चंद कू निरखि कमोदणि फूलैं, हरषि भया मेरे काया जी ।
रग रग सीतल भई मेरी सजनी, हरि मेरे महल सिधायाजी॥
सब भगतन का कारज कीन्हा, सोई प्रभु मै पाया जी ।
मिरा बिरहणि सीतल होई दुख दंद दूर नसाया जी॥
