श्री सोपानदेव महाराज
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श्री सोपानदेव महाराजांचे नमन.
नमो अगणित गुणा | नमो अगम्य ध्याना | नमो कलिविध्वंसगहना | कालरूपा ॥१॥
नमो शून्यादि क्षरा | अक्षरा तू हरा | हरिहर सर्वेश्र्वरा | नमो तुज ॥२॥
वेदविदा विद्वदा | सहज बोधा परमानंदा | अनादि आनंदा | गोविदा तुंज नमो ॥३॥
नमो चित्त विभ्रमा | नमो वृत्ति ध्यानागमा | नमो आगमसमा | ऐशिया परमात्मा तुज नमो ॥४॥
नंमो अनंता अशेषा | नमो सकळ महेशा | जीव शिवादि विश्वेशा | नमो तुज ॥५॥
देव देवोत्तमा सकळा | देवाधिदेवा वेगळा | नमो तुज गोपाळा | चक्रचाळका हरी ॥६॥
नमो विष्णु कृष्णरूपा | नमो शुद्धादिरूपा | नमो नमो भुवनदीपा | नारायणा आदिनाथा ॥७॥
नमो योगिया योगोत्तमा | नमो सर्वांचा तू आत्मा | नमो नमो परब्रह्मा | सर्वारामा आत्मया ॥८॥
नमो नमो नमन | तू जगादि जगजीवन | जगज्जनकु जनार्दन | आनंदघन महामूति ॥९॥
नमो कौतुहलहळणा | नमो भक्त प्रेमपाळणा | परात्पर निधाना | परादि वाचा ॥१०॥
परेहि परतत्त्वा | नाही जेथे रजतमसत्त्वा | वेदादिका देउनी महत्त्वा | पाळण करिसी धर्माचे ॥११॥
अनंत योगाधीशा | अनंत नामाधिवासा | | अनंत तपे सहसा | न जोडसी तू स्वामी ॥१२॥
ऐंशिया विश्वेश्वरादि शिवा | नमो तुज महादेवा |होय जयावरी कृपाहेलावा | तरी सर्व सुख देशी ॥१३॥
भुक्ति मुक्ति विशेषा | दवडुनी मी माझी आक्या | सांडुनी रजतम दुराक्षा | चरणी चित्त रमले ॥१४॥
नमो उद्गोध विशद | तया वरील जो बोध |वरी झळके प्रसिद्ध | तो शुद्धाशुद्ध रस देई ॥१५॥
निविकाराचा विकार | स्वस्वरूपाचा निर्धार |सर्वरूप होऊनि निर्विकार | ग्रास न करिशी माझा ॥१६॥
शमदमादि समश्रेष्ठा | आदि अनादि वरिष्ठा |सकळा होऊनि विशिष्टा | भुवनपदा दावी ॥| १७ | अनंत अनंतेश्वरा | अरुपाचाही आकारा |ग्रास न करुनी निर्धारा | सांठवी हृदयी आपुला ॥१८॥
नाथ दीनानाथा दीनेशा | चित्ताचित्त समरसा |नमो शिवादि शिवेशा | आदि प्रभु ॥१९॥
नमो नमो रामा | नमो नमो भवादिश्रमा |नमो योगादि विश्रामा | आदिपती तुज नमो ॥२०७॥
अवधूत महादत्ता | सकळ दृष्ट तूंचि हर्ता |नमो सकळ कर्ता | आदिसत्ता पे तुझी ॥२१॥
नमो दशानंद परेशा | नमो तुज ऐशिया जगदिशा | तुजविण व्यर्थ भरंवसा | आणिका देवांचा ॥२२॥
नमो नमो हरी मुकूंदा | नमो नभो पावविसी परमपदा | एशिया तुज सदा | पुढती नमो नमो ॥२३॥
वामदक्षिण परिपूर्णा | अधउर्ध्व शूत्यपणा | |तमो तुज सर्वाभरणा | समाधि देशी तुज़ नमो ॥२४॥
वीर्य धैर्य संपन्नगुणा | निराशा आशा अवगुणा |तुज स्मरता पुर्णनिधाना | पावविसी परमपदा ॥२५॥
चतुराचतुर शून्या | वेदशास्त्र श्रुतिमोन्या | सकळजन सौजन्या | नांदसी सभराभरित ॥२६॥
मंजुळ शब्दाचिया गुणा | मंजुळ नादाचिया ध्याना | विश्वरूप अनन्या | वैकुंठी नांदसी सदा ॥२७॥
जगद्गुरु जगदपालका | जगदादि जगन्नायका |वेदादि विवेका | कर्ता हर्ता जगदीशा |॥२८॥
नारायणा पूर्णचैतन्या | पूर्णापूर्ण सौजन्या | श्रुतितुजमाजि मौन्या | मौन्यरूपी नांदसी सदा ॥ २९ तू पस्मेश्वर परेपरता | सकळ देही देहहर्ता |सकळ खूपे हे सत्य वार्ता | बेद बोलोनी गेले ॥३०॥
ऐशिया नमो हो देवा | महामूति निरंजन ठेवा |तो तू पुंडलिक अनुभवा | रूपरेखे आलासी ॥३११॥
विनट विठ्ठलमूर्ति | युगे अठ्ठावीस कीर्ति |वीटे नीट लक्ष्मीपती | भक्तालागी तिष्ठसी ॥३२॥
भक्तालागी दयाळु | दीनदयानिधि गोपाळु |तू द्वारकेचा भूपाळु | बाळलीला अवतरलासी ॥३३॥
निराभिवरासंगम | चंद्रभागेचा उगम | माजी सर्वात्माराम | वृंदावनी खेळसी ॥३४॥
वैकुठादि वैकुंठवासा | वैकुंठरूपा जगदीशा | सर्वज्ञा हृषिकेशा | त्राहे त्राहे स्वामिया ॥३५॥
समाधिधन देवा तूंचि | समाधी सेज तूंचि रची | समाधि हे जिवाची | शिवाशी मेळवी ॥३६॥
अनंत जन्माचे संचित | अनंत दोष दुर्घेटित |अनंत नामाचा संकेत | हारपे तुजमाजी ॥॥३७॥
ऐसी सोपान स्तुति करीत | तेणे संतोषला पंढरीनाथ | त्वा जग तारिले समस्त | कीर्तने करूनी ॥३८॥
नामा म्हणे ऐसे स्तवन | सोपान देवे केले संपूर्ण | मग बोले जगज्जीवन | तयाप्रती ॥३९॥
