राग प्रभाती
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राग प्रभाती
थे तो पलक उघाड़ो दीनानाथ,मै हाजिर-नाजिर कद की खड़ी॥
साजणिया दुसमण होय बैठ्या, सबने लगू कड़ी ।
तुम बिन साजन कोई नहि है, डिगी नाव मेरी समंद अड़ी॥
दिन नहि चैन रैण नही निदरा, सूखू खड़ी खड़ी ।
बाण बिरह का लग्या हिये में, भूलु न एक घड़ी॥
पत्थर की तो अहिल्या तारी बन के बीच पड़ी ।
कहा बोझ मिरा मे करिये सौ पर एक धड़ी॥
