राग धानी
134.
राग धानी
री, मेरे पार निकस गया सतगुर मार्या तीर ।
बिरह-भाल लगी उर अंदर, व्याकुल भया सरीर॥
इत उत चित्त चलै नहि कबहूं, डारी प्रेम-जंजीर ।
कै जाणै मेरो प्रीतम प्यारो, और न जाणै पीर॥
कहा करू मेरो बस नहि सजनी, नैन झरत दोउ नीर ।
मिरा कहै प्रभु तुम मिलिया बिन प्राण धरत नहि धीर॥
