फागुन के दिन चार होल
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फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे ।
बिन सुर राग छतीसू गावै रोम रोम रणकार रे॥
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे ।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥
घटके सब पट खोल दिये है लोकलाज सब डार रे ।
मिराके प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे॥
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फिर बाजे बरनै हरीकी मुरलीया सुनोरे, सखी मेरो मन हरलीनो॥१॥
गोकुल बाजी ब्रिंदाबन बाजी । ज्याय बजी वो तो मथुरा नगरीया॥२॥
तू तो बेटो नंद बाबाको । मै बृषभानकी पुरानी गुजरियां॥३॥
मिरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । हरिके चरनकी मै तो बलैया॥४॥
