मग प्रश्न आदरिला | न
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मग प्रश्न आदरिला | नामा फुंदो जो लागला | का गा ज्ञानदेवो गेला | मज सांडुनिया ॥१॥
कैसा होय तुझा दास | कैसी पाहो तुझी वास | ज्ञानाकारणे कासाविस | जीव माझा होतसे ॥२॥
देव म्हणे नामयासी | तू झणी कासाविस होसी | तू रे तयाते नेणसी | ते कैसे आईक पा ॥३॥
ज्ञानदेव ज्ञानसागरू | ज्ञानदेव ज्ञानागरू |ज्ञानदेव भवसिंधुतारू | प्रत्यक्ष रूपे पै असे ॥४॥
ज्ञानदेवी ज्ञानगम्य | ज्ञानदेवी ज्ञानधर्म्य |ज्ञानदेवी ज्ञाननेम | सर्वथैव पै असे ॥५॥
ज्ञानदेव हाचि देव |ज्ञानदेवी धरलिया भाव | ज्ञान होईल जीवा सर्व | यासी संदेह नाही ॥६॥
ज्ञानदेवी धरिता ध्यान | ध्याता होय समाधान | जीव शिवी परिपूर्ण | एके रात्री कीर्तन केलिया ॥७॥
झणे तू व्याकुळ होसी चित्ते | मनी आठवी गा माते | नामस्मरणे एका चित्ते | रामकृष्ण गोविंद ॥८॥
नामा म्हणे तू समर्थ होसी | अर्जुनी प्रीति करिसी | हे सांगितले व्यासी | एकादशाध्यायी ॥९॥
तैसा पावे तू विश्वेशा | विश्वरुपा जगन्निवासा | मी होतसे कासाविसा | ज्ञानदेवाकारणे ॥१०॥
तरी तू गा युगानयुगी | असशी भक्तांचिया संगी | आम्ही विनटलो पांडुरंगी | रंगारंगी विठ्ठली ॥`११॥
एक वेळ माझा शोक | दूरी जाय हरे विख | ते करी निर्विशेष | नामा येतसे काकुळती ॥१२॥
