राग झंझोटी
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राग झंझोटी
भज ले रे मन, गोपाल-गुना॥
अधम तरे अधिकार भजनसूं, जोइ आये हरि-सरना ।
अबिसवास तो साखि बताऊं, अजामील गणिका सदना॥
जो कृपाल तन मन धन दीन्हौं, नैन नासिका मुख रसना ।
जाको रचत मास दस लागै, ताहि न सुमिरो एक छिना॥
बालापन सब खेल गमायो, तरुण भयो जब रूप घना ।
वृद्ध भयो जब आलस उपज्यो, माया-मोह भयो मगना॥
गज अरु गीधहु तरे भजनसू कोउ तर्यो नहि भजन बिना ।
धना भगत पीपामुनि सिवरी, मिराकीहू करो गणना॥
