पायो जी म्हे तो राम
6.
पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो ।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग मे सभी खोवायो ।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो ।
'मिरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥
