राग देस
104.
राग देस
पिया मोहि दरसण दीजै हो ।
बेर बेर मै टेरहूं, या किरपा कीजै हो॥
जेठ महीने जल बिना पंछी दुख होई हो ।
मोर असाढ़ा कुरलहे घन चात्रा सोई हो॥
सावण मे झड़ लागियो, सखि तीजा खेलै हो ।
भादरवै नदिया वहै दूरी जिन मेलै हो॥
सीप स्वाति ही झलती आसोजा सोई हो ।
देव काती मे पूजहे मेरे तुम होई हो॥
मंगसर ठंड बहोती पड़ै मोहि बेगि सम्हालो हो ।
पोस मही पाला घणा,अबही तुम न्हालो हो॥
महा मही बसंत पंचमी फागा सब गावै हो ।
फागुण फागा खेलहै बणराय जरावै हो॥
चैत चित्त मे ऊपजी दरसण तुम दीजै हो ।
बैसाख बणराइ फूलवै कोमल कुरलीजै हो॥
काग उड़ावत दिन गया बूझू पंडित जोसी हो ।
मिरा बिरहण व्याकुली दरसण कद होसी हो॥
