राम मिलण के काज सखी
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राम मिलण के काज सखी मेरे आरति उर मे जागी री ।
तड़पत-तड़पत कल न परत है बिरहबाण उर लागी री ।
निसदिन पंथ निहारू पिवको पलक न पल भर लागी री ।
पीव-पीव मै रटू रात-दिन दूजी सुध-बुध भागी री ।
बिरह भुजंग मेरो डस्यो कलेजो लहर हलाहल जागी री ।
री आरति मेटि गोसाई आय मिलौ मोहि सागी री ।
मिरा ब्याकुल अति उकलाणी पिया की उमंग अति लागी री ।
