आई ती ते भिस्ती जनी
9.
आई ती ते भिस्ती जनी जगत देखके रोई ।
मातापिता भाईबंद सात नही कोई ।
मेरो मन रामनाम दुजा नही कोई॥धृ०॥
साधु संग बैठे लोक लाज खोई । अब तो बात फैल गई ।
जानत है सब कोई॥१॥
आवचन जल छीक छीक प्रेम बोल भई । अब तो मै फल भई ।
आमरूत फल भई॥२॥
शंख चक्र गदा पद्म गला । बैजयंती माल सोई ।
मिरा कहे नीर लागो होनियोसी हो भई॥३॥
