राम रतन धन पायो ।
50.
राम रतन धन पायो ।
पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो ।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु,
किरपा कर अपनायो ।
जनम जनम की पूँजी पाई,
जग मे सभी खोवायो ।
खरच न खूटै चोर न लूटै,
दिन दिन बढ़त सवायो ।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु,
भवसागर तर आयो ।
मिरा के प्रभु गिरधर नागर,
हरख हरख जस गायो ।
