राग बिहाग
98.
राग बिहाग
स्याम मोरी बांहड़ली जी गहो ।
या भवसागर मंझधार मे थे ही निभावण हो॥
म्हाने औगण घणा रहै प्रभुजी थे ही सहो तो सहो ।
मिरा के प्रभु हरि अबिनासी लाज बिरद की बहो॥
98.
राग बिहाग
स्याम मोरी बांहड़ली जी गहो ।
या भवसागर मंझधार मे थे ही निभावण हो॥
म्हाने औगण घणा रहै प्रभुजी थे ही सहो तो सहो ।
मिरा के प्रभु हरि अबिनासी लाज बिरद की बहो॥