जब देखा तब गावा । तो
४०.
जब देखा तब गावा । तो जना धिरज पावा । नाद समाई लोरे सद्रुरू भेटले देवा ॥१॥
जै जिनमिल कारजिसंता । तहे अनाहद शब्द बिजंता ॥२॥
जोति जोत समानी । मै गुरु प्रसादी जानी ॥३॥
रतन कमल कोठडी चमकार बिजल तही नही दूर । निज आत्मा मेरा है रह्या भरपूर ॥४॥
जहे अनाहद सूर उजाडा । तहे दिपक जले छंछारा ॥५॥
गुरुप्रसादी जान्या । जन नामा सहज समान्या ॥६॥
