राग प्रभाती
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राग प्रभाती
जागो म्हांरा जगपतिरायक हंस बोलो क्यू नहीं॥
हरि छो जी हिरदा माहि पट खोलो क्यू नहीं॥
तन मन सुरति संजोइ सीस चरणा धरू ।
जहा जहा देखू म्हारो राम तहा सेवा करूं॥
सदकै करू जी सरीर जुगै जुग वारणै ।
छोड़ी छोड़ी लिखू सिलाम बहोत करि जानज्यौ ।
बंदी हू खानाजाद महरि करि मानज्यौ॥
हा हो म्हारा नाथ सुनाथ बिलम नहि कीजिये ।
मिरा चरणा की दासि दरस फिर दीजिये॥
