सखी, मेरी नींद नसानी
23.
सखी, मेरी नींद नसानी हो ।
पिवको पंथ निहारत सिगरी रैण बिहानी हो॥
सखिअन मिलकर सीख दई मन, एक न मानी हो ।
बिन देख्या कल नाहि पड़त जिय ऐसी ठानी हो॥
अंग अंग व्याकुल भई मुख पिय पिय बानी हो ।
अंतरबेदन बिरह की कोई पीर न जानी हो॥
ज्यू चातक घनकू रटै, मछली जिमि पानी हो ।
मिरा व्याकुल बिरहणी सुद बुध बिसरानी हो॥
