मेरो मनमोहना, आयो नह
14.
मेरो मनमोहना, आयो नही सखी री॥
कै कहु काज किया संतन का, कै कहु गैल भुलावना॥
कहा करू कित जाऊ मेरी सजनी, लाग्यो है बिरह सतावना॥
मिरा दासी दरसण प्यासी, हरिचरणा चित लावना॥
14.
मेरो मनमोहना, आयो नही सखी री॥
कै कहु काज किया संतन का, कै कहु गैल भुलावना॥
कहा करू कित जाऊ मेरी सजनी, लाग्यो है बिरह सतावना॥
मिरा दासी दरसण प्यासी, हरिचरणा चित लावना॥