राग होरी सिन्दूरा
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राग होरी सिन्दूरा
फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे ।
बिन सुर राग छतीसू गावै रोम रोम रणकार रे॥
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे ।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥
घटके सब पट खोल दिये है लोकलाज सब डार रे ।
मिराके प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे॥
